अनुस्मारक स्वयं को |

काफी वक़्त बीत गया यूँ ही बहते बहते,

लगा अब खुद ही कुछ कर लेते,

याद आया गुम तो स्वयं ही हुआ था,

फिर क्यूँ उसे दोष दूँ,

फिर याद दिलाया स्वयं को,

जो खोज रहा वह तो अंतरत ही मेरे साथ है,

वो तो अनंत तक आत्मसात है,

है जो अभिव्यक्ति स्वयं में वो सिर्फ तुम्हें ही ज्ञात है|

एक नए कल की है शुरुआत

एक नए कल की है शुरुआत,
एक नए विचार की है अब बात,
सम्भव है विचारों का अंतर्द्वंद्व,
असम्भव नहीं है उनका क्रियान्वन।

अनुभव की नहीं है अब बात,
अनुशासन व नीयत की है अब बात,
सम्भव है स्वयं की आशा से कार्य चुनौतीपूर्ण हो,
असम्भव नहीं है कि हम इस दौड़ में ही ना सफल हो।

बस अंधी होड़ से हो मुक्त, ये एक नयी शुरुआत,
है एक नए कल की शुरुआत,
है एक बदलते भारत की बात,
मुमकिन है…………एक नए कल की शुरुआत।

समय का उत्तर

कभी स्वयं से भी प्रश्न ना करने वाले लोग,

आज प्रश्नों की झड़ी लगाये खड़े है|

 

कभी अपनों को भी गैर बना चुके लोग,

आज गैरों की फ़िक्र करने लगे है|

 

कभी “एकलाचलो” की राग अलापने वाले लोग,

आज सभी को साथ लेकर चलने की बात करने लगे है|

 

क्या कुछ बदला, बस यही प्रश्न बार – बार आया,

कुछ तो बदला जरुर है, कुछ तो बदल रहा है,

क्यूंकि बदलाव निरंतर है, यही समय का हम सबको उत्तर है|

संवाद अधूरा है

अभिव्यक्ति को जाने बिना,

यथायोग्य शब्दों की उपयुक्ति बिना,

भाषा के व्यवहार को सयंमित किये बिना,

स्वयं के अंतःकरण में सौम्यता लाये बिना,

सम्यक विचारों के अभिप्राय के बिना,

 

प्रत्यक्ष, परोक्ष के परिवेश में,

निहित स्वार्थ के प्रगमन के बिना,

 

संवाद अधूरा है,

संवाद अधूरा है….

 

“हिन्दी – मेरे हृदय की वेदना”

हिन्दी भाषा पर उपजे अनर्गल विवाद पर कुछ पंक्तियाँ|
हिन्दी भाषा के हृदय में शायद यही कुछ अनकहा रहा होगा|

“हिन्दी – मेरे हृदय की वेदना”

व्यर्थ ही द्वेष फैला रहे लोग,
मेरे नाम पर मुझे ही अभियुक्त बना रहे लोग,
क्या किसी भाषा ने किसी देश-प्रदेश की संस्कृति को तोड़ा,
मैंने तो सदियों की प्राचीन- नवीन परम्पराओं को एक सूत्र में जोड़ा|

अब तो संवाद को भी तोल रहे हम,
मेरी तेरी करके स्वयं ही अपनी भाषा के मूल व्यवहार को भूल रहे हम,
लगा था मुझे की मैं अब तो इस राष्ट्र के ह्रदय को समर्पित हूँ,
लगा था मुझे की मैं अब तो इस राष्ट्र की पहचान को लेकर गर्वित हूँ,
पर क्या पता था कि लोग मेरी अभिव्यक्ति,
मेरे द्वारा व्यक्त आचार – विचार ,
मुझमें निहित सौम्य भाव को भूल,
भावों को सम्प्रेषण देने वाली अनेक भाषाओं को बस एक दूसरे पर थोपने में लगे है,
अपने ही भावों की अकृष्ट तुलना में जुटे है,
बस इसी पर मैं स्वयं से लज्जित हूँ|

बस यही प्रश्न लेकर मूक हूँ,
क्या मैं योजक सेतु से विसंबंधन निमित्त बन गई हूँ?